101-Sant Kabir ke dohe with meaning in hindi

kabir ke dohe

Kabir ke dohe संत कबीर दस जी का जन्म 1398 ईस्वी में भारत में हुआ था। वह 120 साल तक जीवित रहे और कहा जाता है कि उन्होंने 1518 में अपने शरीर को त्याग दिया था

Sant kabir कबीर के काव्य  का सौंदर्य उनकी सरलता में है  कबीर के दोहे । कबीर की कविता दो पंक्तियों या दोहा के रूप में है कबीर के दोहे हमारे दैनिक जीवन को घेरने वाली स्थितियों को उठाती है।

 इस प्रकार आज भी, कबीर की कविता सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों ही संदर्भों में हमारे जीवन को निर्देशित और विनियमित करने के लिए प्रासंगिक और सहायक है।

 Kabir के दोहे उनकी कविताएँ विशुद्ध रूप से भक्तिमय हैं और विनम्रता सिखाती हैं।

Tulsidas तुलसी दास Rahim das राहीम दास कबीर दास प्रसिद्ध भारतीय कवि थे उनकी कविता में एक अनोखी शैली है, जो 2 पंक्ति द्वारा सामाजिक स्थितियों का वर्णन करते हैं

कबीर दस जी ने भारत में भक्ति आंदोलन की शुरुआत की और भक्ति आंदोलन में महावतपूर्ण योगदान दिया

Dohe meaning 

Dohe  दोहे का अर्थ है 2 पंक्ति का वाक्य जिसका उपयोग दो रेखाओं में लोगों को अच्छी और बुरी सामाजिक स्थिति का वर्णन करने और लोगों को सीखने के लिए किया जाता है

 
sant kabir das ji ke dohe in hindi

kabir ke dohe best 10

 dohe of kabir in hindi  -कबीर के दोहे इन हिन्दी

दोहा-1

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिलखोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय||

अर्थ : जब मैं इस दुनिया में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई व्यक्ति बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.

दोहा-2 

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर दुनिया में कितने ही व्यक्ति मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर  अच्छी तरह पढ़ ले, तो वे प्यार का वास्तविक रूप जानले ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा |

दोहा-3

धीरे-धीरेरेमना, धीरे सब कुछ होय,।

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

अर्थ :  कबीर दास जी कहते है की मन में धीरज  और सबूरी रखने से जीवन मे  सब कुछ प्राप्त होता है. यदि कोई माली किसी पेड़ कोसौ घड़े पानी से सींचने लगे और उमीद करे के वो फल डेंगा तो वो ग़लत है   क्यू की फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा!

दोहा-4  

जाति न पूछोसाधुकी, पूछ लीजिये ज्ञान,।

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

अर्थ : सज्जन एक अच्छा व्यक्ति की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान कोसमझना चाहिए. तलवार का मूल्य होता है न कि उसे ढकने वाले  मयान का

 

दोहा-5

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,।

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥

अर्थ : जो लोग प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर ही आता है. लेकिन कुछ लोग जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते.

 

दोहा-6

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,।

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि ॥

अर्थ : यदि कोई व्यक्ति सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता होता  है कि बोली एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह अपने  हदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है.

दोहा-7

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥

अर्थ : कबीर दस जी कहते है की किसी व्यक्ति के लिया  न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ठीक है.जिस प्रकार अधिक वर्षा  अच्छी नहीं  होती उसी प्रकार बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है | sant kabir dohe 

 

दोहा-8

 

कबीराखड़ा बाज़ार में, मांगे सबकीखैर,।

ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर.।।

अर्थ :इस दुनिया  में आकर कबीर दा जी बस इतना ही  चाहते हैं  कि जीवन में  सबका भला हो और दुनिया में यदि किसी से दोस्ती नहीं हो तो किसी से बैर भी न हो!

दोहा-9

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना।

आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि  राम के भक्त हिन्दू  हैं और मुसलमान को रहमान प्यारे है. इसी बात पर दोनों लड़ कर मार रहे है  पर सच क्या है ये कोई जान ने के कोशिस नाइ कर रहा है

दोहा-10

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर.।

आसा जिसना न मुई,यों कही गए कबीर.|

अर्थ : कबीर दास जी  कहते हैं कि दुनिया में  न माया मरती है न मन.  न जाने कितनी बार मर चुका ये शरीर body पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती | 

hindi kabir das ke dohe(बुद्धि)

 

dohe on gyan

 दोहे और उनके अर्थ

दोहा-1

मन के हारे हार  है मन के जीतेजीत

कहे कबीर गुरु पाइये,मन ही के परतीत।

अर्थ : यदि मन से उत्साह पूर्वक जीत अनुभव करते हैं तो अवश्य आप की जीत होगी। यदि आप हृदय से गुरु की खोज करेंगे तो निश्चय हीं आपको सदगुरु मिलकर रहेंगे।

दोहा-2

कोई निन्दोई कोई बंदोई सिंघी स्वान रु स्यार

हरख विशाद ना केहरि,कुंजर गज्जन हार।

अर्थ : किसी की निन्दा एंव प्रशंसा से ज्ञानी व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता सियार या कुत्तों के भौंकने से सिंह पर कोई असर नहीं होता कारण वह तो हाथी को भी मार सकता है।

दोहा-3

दुखिया मुआ दुख करि सुखिया सुख को झूर

दास आनंदित राम का दुख सुख डारा दूर।

अर्थ : दुखी प्राणी दुख मे मरता रहता है एंव सुखी व्यक्ति अपने सुख में जलता रहता है पर ईश्वर भक्त हमेशा दुख-सुख त्याग कर आनन्द में रहता है। 

दोहा-4

हिंदु कहुॅं तो मैं नहीं मुसलमान भी नाहि

पंच तत्व का पूतला गैबी खेले माहि।

अर्थ : मैं न तो हिन्दु हूॅ अथवा नहीं मुसलमान। इस पाॅंच तत्व के शरीर में बसने वाली आत्मा न तो हिन्दुहै और न हीं मुसलमान।

दोहा-5

कागद केरी नाव री, पानी केरी गंग

कहे कबीर कैसे तिरे, पाॅंच कुसंगी संग।

अर्थ : यह शरीर कागज की तरह नाशवान है जो संसार रुपी नदी के इच्छााओं-वासनावओं में डूबा  हुआ है। जब तक अपने पाॅंचों ज्ञानेद्रियों का नियंत्रन नहीं कर लिया जाता है तब तक संसार से मुक्ति नहीं हो सकती।

दोहा-6

जेती लहर समुद्र की, तेती मन की दौर

सहजय हीरा नीपजय, जो मन आबै ठौर।

अर्थ : समुद्र मे जिस तरह असंख्य लहरें उठती है उसी प्रकार मन विचारों कर अनगिनत तरंगे आती-जाती है।यदि अपने मन को सहज, सरल और शांत कर लिया जाये तो सत्य का ज्ञान संभव है।

दोहा-7

तन का बैरी कोई नहीं जो मन सीतल होये

तु आपा को डारी दे, दया करै सब कोई।

अर्थ : यदि तुम्हारा मन शांत,निर्मल एंव पवित्र है तो तुम्हारा कोई शत्रु नही है। यदि तुमने अपने मान-समान-अभिमान का परित्याग कर दिया है तो सारा संसार तुमसे प्रेम करेगा। 

दोहा-8

चिउटी चावल ले चली बीच मे मिलि गयी दाल

कहे कबीर दौउ ना मिलै एक लै दूजी दाल।

अर्थ : चींटी चावल का दाना लेकर चली तो बीच में उसे दाल मिला पर वह दोनों नहीं पा सकती है। उसे एक छोड़ना पड़ेगा। प्रभु भक्तिके लिये उसे संसारिक माया-मोह छोड़ना होगा।

दोहा-9

कबीर पढ़ना दूर करु, अति पढ़ना संसार

पीर ना उपजय जीव की, क्यों पाबै निरधार।

अर्थ : कबीर अधिक पढ़ना छोड़ देने कहते हैं। अधिक पढ़ना सांसारिक लोगों का काम है। जब तक जीवों के प्रति हृदय में करुणा नहीं उत्पन्न होता,निराधार प्रभु की प्राप्ति नहीं होगी।

दोहा-10

पंडित पढ़ते वेद को, पुस्तक हस्ति लाद

भक्ति ना जाने राम की, सबे परीक्षा बाद।

अर्थ : पंडित वेदों को पढ़ते है। हाथी पर लादने लायक ढ़ेर सारी पुस्तकें पढ़ जाते हैं। किंतु यदि वे राम की भक्ति नहीं जानते हैं-तो उनका पढ़ना व्यर्थ है और उनकी परीक्षा बेेकार चली जाती है।

दोहा-11

पढ़ि पढ़ि और समुझाबै, खोजि ना आप शरीर

आपहि संसय मे परे, यूॅं कहि दास कबीर।

अर्थ : पढ़ते-पढ़ते और समझाते भी लोग अपने शरीर को मन को नहीं जान पाता हैं। वे स्वयं भ्रम में पड़े रहते हैं। अधिक पढ़ना व्यर्थ है। अपने अन्तरात्मा को पहचाने।

दोहा-12

पढ़ना लिखना चातुरी, यह तो काम सहल्ल

काम दहन मन बसिकरन गगन चढ़न मुस्कल्ल।

अर्थ : पढ़ना लिखना चतुराई का आसान काम है किंतु इच्छाओं और वासना का दमन और मन का नियंत्रण आकाश पर चढ़ने की भांति कठिन है। 

दोहा-13

कबीर ब्राहमन की कथा, सो चोरन की नाव

सब मिलि बैठिया, भावै तहं ले जाइ।

अर्थ :  कबीर के अनुसार अविवेकी ब्राम्हण की कथा चोरों की नाव की भांति है। पता नहीं अधर्म और भ्रम उन्हें कहाॅं ले जायेगा?

दोहा-14

हरि गुन गाबै हरशि के, हृदय कपट ना जाय

आपन तो समुझय नहीं, औरहि ज्ञान सुनाय।

अर्थ : अपने हृदय के छल कपट को नहीं जान पाते हैं। खुद तो कुछ भी नहीं समझ पाते है परन्तु  दूसरों के समक्ष अपना ज्ञान बघारते है।

दोहा-15

चतुराई पोपट पढ़ी, परि सो पिंजर माहि

फिर परमोधे और को, आपन समुझेये नाहि।

अर्थ : चालाकी और चतुराई व्यर्थ है। जिस प्रकार तोता पढ़कर भी पिंजड़े में बंद रहता है। पढ़ाकू पढ़ता भी है और उपदेश भी करता है परंतु स्वयं कुछ भी नहीं समझता | 

kabir ke vani(प्रेम)

dohe on prem

दोहा-1

नेह निबाहन कठिन है, सबसे निबहत नाहि

चढ़बो मोमे तुरंग पर, चलबो पाबक माहि।

अर्थ : प्रेम का निर्वाह अत्यंत कठिन है। सबों से इसको निभाना नहीं हो पाता है। जैसे मोम के घोंड़े पर चढ़कर आग के बीच चलना असंभव होता है।

दोहा-2

प्रेम पंथ मे पग धरै, देत ना शीश डराय

सपने मोह ब्यापे नही, ताको जनम नसाय।

अर्थ : प्रेम के राह में पैर रखने वाले को अपने सिर काटने का डर नहीं होता। उसे स्वप्न में भी भ्रम नहीं होता और उसके पुनर्जन्म का अंत हो जाता है।

दोहा-3

प्रेम पियाला सो पिये शीश दक्षिना देय

लोभी शीश ना दे सके, नाम प्रेम का लेय।

अर्थ : प्रेम का प्याला केवल वही पी सकता है जो अपने सिर का वलिदान करने  को तत्पर हो। एक लोभी-लालची अपने सिर का वलिदान कभी नहीं दे सकता भले वह कितना भी प्रेम-प्रेम चिल्लाता हो। 

दोहा-4

प्रेम ना बारी उपजै प्रेम ना हाट बिकाय

राजा प्रजा जेहि रुचै,शीश देयी ले जाय।

अर्थ : प्रेम ना तो खेत में पैदा होता है और न हीं बाजार में विकता है। राजा या प्रजा जो भी प्रेम का इच्छुक हो वह अपने सिर का यानि सर्वस्व त्याग कर प्रेम प्राप्त कर सकता है। सिर का अर्थ गर्व या घमंड का त्याग प्रेम के लिये आवश्यक है।

दोहा-5

प्रीति बहुत संसार मे, नाना बिधि की सोय

उत्तम प्रीति सो जानिय, राम नाम से जो होय।

अर्थ : संसार में अपने प्रकार के प्रेम होते हैं। बहुत सारी चीजों से प्रेम किया जाता है। पर सर्वोत्तम प्रेम वह है जो राम के नाम से किया जाये।

दोहा-6

प्रेम प्रेम सब कोई कहै, प्रेम ना चिन्है कोई

जा मारग हरि जी मिलै, प्रेम कहाये सोई।

अर्थ : सभी लोग प्रेम-प्रेम बोलते-कहते हैं परंतु प्रेम को कोई नहीं जानता है। जिस मार्ग पर प्रभु का दर्शन  हो जाये वही सच्चा प्रेम का मार्ग है।

दोहा-7

साजन सनेही बहुत हैं, सुख मे मिलै अनेक

बिपति परै दुख बाटिये, सो लाखन मे ऐक।

अर्थ : सुख मे अनेक सज्जन एंव स्नेही  बहुतायत से मिलते हैं पर विपत्ति में दुख वाटने वाला लाखों मे एक ही मिलते हैं।

दोहा-8

राम रसायन प्रेम रस, पीबत अधिक रसाल

कबीर पिबन दुरलभ है, मांगे शीश कलाल।

अर्थ : राम नाम की दवा प्रेम रस के साथ पीने में अत्यंत मधुर है। कबीर कहते हैं कि इसे पीना अत्यंत दुर्लभ है क्यों कि यह सिर रुपी अंहकार का त्याग मांगता है। 

दोहा-9

यह तट वह तट ऐक है, ऐक प्रान दुइ गात

अपने जीये से जानिये, मेरे जीये की बात।

अर्थ : प्रेम की धनिष्टता होने पर प्रेमी और प्रिय दोनों एक हो जाते हैं। वस्तुतः वे एक प्राण और  दो शरीर हो जाते हैं। अपने हृदय की अवस्था जानकर अपने प्रेमी के हृदय की स्थिति जान जाते हैं।

दोहा-10

प्रे्रेम छिपाय ना छिपै, जा घट परगट होय

जो पाऐ मुख बोलै नहीं, नयन देत है रोय।

अर्थ : हृदय का प्रेम किसी भी प्रकार छिपाया नहीं जा सकता । वह मुहॅं से नहीं बोलता है पर उसकी आखे प्रेम की विह्वलता के कारण रोने लगता है। hindi dohe with meaning

kabir Amritvani in hindi( मोह, माया, लोभ)

 

dohe on moha maya lobh

दोहा-1

कबीर माया पापिनी, हरि सो करै हराम

मुख कदियाली, कुबुधि की, कहा ना देयी राम।

अर्थ : कबीर कहते है की माया पापिनी है। यह हमें परमात्मा से दूर कर देती है। यक मुंह को भ्रष्ट कर के राम का नाम नहीं कहने देती है।

दोहा-2

माया का सुख चार दिन, काहै तु गहे गमार

सपने पायो राज धन, जात ना लागे बार।

अर्थ : माया मोह का सुख चार दिनों का है। रे मूर्ख-तुम इस में तम पड़ो। जिस प्रकार स्वपन में प्राप्त राज्य धन को जाते दिन नहीं लगते है।

दोहा-3

माया दासी संत की, साकट की सिर ताज

साकट की सिर मानिनि, संतो सहेली लाज।

अर्थ : माया संतों की दासी और संसारीयों के सिर का ताज होती है। यह संसारी लोगों को खूब नचाती है लेकिन संतो के मित्र और लाज बचाने वाली होती है। 

दोहा-4

कबीर माया पापिनी, फंद ले बैठी हाट

सब जग तो फंदे परा, गया कबीरा काट।

अर्थ : कबीर कहते है की समस्त माया मोह पापिनी है। वे अनेक फंदा जाल लेकर बाजार में बैठी है। समस्त संसार इस फांस में पड़ा है पर कबीर इसे काट चुके है।

 दोहा-5

कबीर माया पापिनी, हरि सो करै हराम

मुख कदियाली, कुबुधि की, कहा ना देयी राम।

अर्थ : कबीर कहते है की माया पापिनी है। यह हमें परमात्मा से दूर कर देती है। यक मुंह को भ्रष्ट कर के राम का नाम नहीं कहने देती है।

दोहा-6

कबीर माया रुखरी, दो फल की दातार

खाबत खर्चत मुक्ति भय, संचत नरक दुआर।

अर्थ : कबीर का कथन है की माया एक बृक्ष की तरह है जो दो प्रकार का फल देती है। यदि माया को अच्छे कार्यों में खर्च किया जाये तो मुक्ति है पर यह संचय करने वाले को नरक के द्वार ले जाती है।

दोहा-7

गुरु को चेला बिश दे, जो गठि होये दाम

पूत पिता को मारसी ये माया को काम।

अर्थ : यदि शिष्य के पास पैसा हो तो वह गुरु को भी जहर दे सकता है। पुत्र पिता की हत्या कर सकता है। यही माया की करनी है।

दोहा-8

ज्ञान भक्ति वैराग्य सुख पीव ब्रह्म लौ ध़ाये

आतम अनुभव सेज सुख, तहन ना दूजा जाये।

अर्थ : ज्ञान,भक्ति,वैराग्य का सुख जल्दी से तेज गति से भगवान तक पहुॅंचाता है। पर आत्मानुभव आत्मा और परमात्मा का मेल कराता है। जहाॅं अन्य कोई प्रवेश नहीं कर सकता है।

दोहा-9

अहिरन की चोरी करै, करै सुई की दान

उॅचे चढ़ि कर देखता, केतिक दूर बिमान।

अर्थ : लोग लोहे की चोरी करते हैं और सूई का दान करते हैं। तब उॅंचे चढ़कर देखते हैं कि विमान कितनी दूर है। लोग जीवन पर्यन्त पाप करते हैं और अल्प दान करके देखते हैं-सोंचते हैं कि उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिये विमान कितनी दूर पर है और कब ले जायेगा।

दोहा-10

आशा तजि माया तजी मोह तजी और मन

हरख,शोक निंदा तजइ कहै कबीर संत जान।

अर्थ :जो व्यक्ति आशा, माया और मोह को त्याग देता है तथा जिसने सुख, शोक निन्दा का परित्याग करदिया है कबीर के कथाअनुसार वही सत्य पर है।

दोहा-11

कुरुक्षेत्र सब मेदिनी, खेती करै किसान

मोह मिरग सब छोरि गया, आस ना रहि खलिहान।

अर्थ : यह भुमि कुरुक्षेत्र की भाॅंति पवित्र है। किसान खेती करते हैं परंतु मोह-माया रुपी मृग सब चर गया। खलिहान में भंडारण हेतु अन्न कुछ भी शेष नहीं रहता। 

दोहा-12

अपना तो कोई नहीं, हम काहु के नाहि

पार पंहुचि नाव जब, मिलि सब बिछुरै जाहि।

अर्थ : इस संसार मेरा अपना कोई नहीं है। हम भी किसी के अपने नहीं हं। जब नाव उस पार पहूॅचेगी तब उस पर मिलने वाले सभी विछुड़ जायेगें।यह नाव रुपी संसार है।

दोहा-13

अपना तो कोई नहीं, देखा ठाोकि बजाय

अपना अपना क्या करे, मोह भरम लिपटाय।

अर्थ : इस संसार में अपना कोई नहीं हैं। इसे काफी जाॅंच परख कर देख लिया है।अपना-अपना करना व्यर्थ है। सभी लोग मोह माया और भ्रम के जाल में फंसे है।

दोहा-14

मोह सलिल की धार मे, बहि गये गहिर गंभीर

सुक्षम माछली सुरति है, चढ़ती उलटि नीर।

अर्थ : मोह माया के बहाव में बड़े-बड़े लोग बह जाते है। मोह नदी की धारा की भॅंति है। एक छोटी मछली ज्ञानी की भॅंति धारा की उलटी दिशामें तैर कर नदी पार कर जाती है।

दोहा-15

सुर, नर ऋषि मुनि सब फसे, मृग तृशना जग मोह

मोह रुप संसार है, गिरे मोह निधि जोह।

अर्थ : देवता,मनुष्य,ऋषि,मुणि सभी मृग तृष्णा रुपी संसार के मोह में फॅंसे हैं। यह संसार माया जाल स्वरुप है। सभी माया-मोह के समुद्र में गिरे पड़े है।

दोहा-16

प्रथम फंदे सब देवता, बिलसै स्वर्ग निवास

मोह मगन सुख पायीया, मृत्यु लोक की आस।

अर्थ : मोह में देवता लोग स्वर्ग में रहकर सुख और आनंद का उपभोग करने लगे। लेकिन मोह में अधिक फंस कर अधिकाधिक सुख के लिये मृत्यु लोक की कामना करने लगे। यही मोह पतन का कारण है।  

दोहा-17

अस्ट सिद्धि नव निधि लौ सब ही मोह की खान

त्याग मोह की वासना, कहे कबीर सुजान।

अर्थ : आठों प्रकार की सिद्धियाॅं और नौ प्रकार की निधियाॅ सब माया मोह की खान हैं। ज्ञानी कबीर कहते है कि हमें मोह माया की इच्छाओं का त्याग करना चाहिये।

दोहा-18

कबीर औंधि खोपड़ी, कबहुॅं धापै नाहि

तीन लोक की सम्पदा, का आबै घर माहि।

अर्थ : कबीर के अनुसार लोगों की उल्टी खोपड़ी धन से कभी संतुष्ट नहीं होती तथा हमेशा सोचती है कि तीनों लोकों की संमति कब उनके घर आ जायेगी।

दोहा-19

जब मन लागा लोभ से, गया विषय मे भोय

कहै कबीर विचारि के, केहि प्रकार धन होय।

अर्थ : जब लोगों का मन लोभी हो जाता है तो उसका मन बिषय भोग में रत हो जाता है और वह सब भूल जाता है और इसी चिंता में लगा रहता है कि किस प्रकार धन प्राप्त हो।

दोहा-20

बहुत जतन करि कीजिये, सब फल जाय नशाय

कबीर संचय सूम धन, अंत चोर ले जाय।

अर्थ :  अनेक प्रयत्न से लोग धन जमा करते है पर वह सब अंत में नाश हो जाता है। कबीर का मत है कि कंजूस व्यक्ति धन बहुत जमा करता है पर अंततः सभी चोर ले जाता है। 

दोहा-21

जोगी जंगम सेबड़ा, सन्यासी दरबेश

लोभ करै पावे नहि, दुर्लभ हरि का देश।

अर्थ :  योगी, साधु,संन्यासी या भिक्षुक जो भी लोभ करेगा उसे परमात्मा का दुर्लभ देश या स्थान नहीं प्राप्त हो सकता है।

दोहा-22

कबीर टुक टुक देखता, पल पल गयी बिहाये

जीव जनजालय परि रहा, दिया दमामा आये।

अर्थ : कबीर टुकुर टुकुर धूर कर देख रहे है। यह जीवन क्षण क्षण बीतता जा रहा है। प्राणी माया के जंजाल में पड़ा हुआ है और काल ने कूच करने के लिये नगारा पीट दिया है।

दोहा-23

कबीर सब सुख राम है, और ही दुख की राशि

सुा, नर, मुनि, जन,असुर, सुर, परे काल की फांसि।

अर्थ : केवल प्रभु समस्त सुख देने वाले है। अन्य सभी दुखों के भंडार है।देवता, आदमी, साधु, राक्षस सभी मृत्यु के फांस में पड़े है। मृत्यु किसी को नहीं छोड़ता।राम ही सुखों के दाता है।

दोहा-24

कपास बिनुथा कापड़ा, कादे सुरंग ना पाये

कबीर त्यागो ज्ञान करि, कनक कामिनि दोये।

अर्थ :  जिस प्रकार गंदे कपास से सुन्दर वस्त्र नहीं बन सकता है-कबीर ज्ञान की बात कहते है की हमें स्वणं और स्त्री दोनो का लगाव त्यागना चाहिये।

दोहा-25

कलि मंह कनक कामिनि, ये दौ बार फांद

इनते जो ना बंधा बहि, तिनका हूॅ मै बंद।

अर्थ : कलियुग में जो धन और स्त्री के मोह मे नहीं फंसा है-भगवान उसके हृदय से बंधे हुये है क्योंकि ये दोनों माया मोह के बड़े फंदे है। 

दोहा-26

शंकर हु ते सबल है, माया येह संसार

अपने बल छुटै नहि, छुटबै सिरजनहार।

अर्थ : यह संसार एक माया है जो शंकर भगवान से भी अधिक बलवान है। यह स्वंय आप के प्रयास से कभी नहीं छुट सकता है। केवल प्रभु ही इससे आपको उवार सकते है।

दोहा-27

कामी कबहु ना हरि भजय, मिटय ना संशय सूल

और गुनाह सब बखशी है, कामी दल ना मूल।

अर्थ : एक कामी पुरुष कभी भगवान का भजन नहीं करता हैं। उसके भ्रम एंव कष्ट का निवारन कभ्री नहीं होता हैै। अन्य लोगों के पाप को क्षमा किया जा सकता है पर लोभी को कभी मांफी नहीं दीजा सकती है।

दोहा-28

केता बहाया बहि गया, केता बहि बहि जाये

एैसा भेद विचारि के, तु मति गोता खाये।

अर्थ : कितने लोग इस भव सागर मे बह गये और अभी भी कितने बह रहे है। इस रहस्य पर विचार करो। तुम इस बिषय वासना में डूबकी मत लगाओ।

दोहा-29

चलो चलो सब कोये कहै, पहुचै बिरला कोये

ऐक कनक औरु कामिनि, दुरगम घाटी दोये।

अर्थ : परमात्मा तक जाने के लिये सभी चलो-चलो कहते है पर वहाॅ तक शायद ही कोई पहूॅच पाता है। धन और स्त्री रुपी दो अत्यंत खतरनाक बीहड़ घाटियों को पार कर के ही कोई परमात्मा की शरण में पहूॅच सकता है।

दोहा-30

नारी नरक ना जानिये, सब सौतन की खान

जामे हरिजन उपजै, सोयी रतन की खान।

अर्थ : नारी को नरक मत समझो। वह सभी संतों की खान है। उन्हीं के द्वारा भगवत पुरुषों कि उत्पत्ति होती है और वे ही रत्नों की खान है। प्रभु भक्तों को नारी ही जन्म देती है। 

dohe in hindi with meaning(मन)

 

kabir ke dohe on maan

 dohe in hindi with meaningकबीर के दोहे मीठी वाणी

दोहा-1

कबहुुक मन गगनहि चढ़ै, कबहु गिरै पाताल

कबहु मन अनमुनै लगै, कबहु जाबै चाल।

अर्थ : कभी तो मन मगन में बिहार करता है। और कभी पाताल लोक में गिर जाता है। कभी मन ईश्वर के गहन चिंतन में रहता है और कभी संासारिक बिषयों में भटकता रहता है।यह मन अत्यंत चंचल है।

दोहा-2

दसो दिशा से क्रोध की उठि अपरबल आग शीतल संगत साध की तहां उबरिये भाग।

अर्थ : सम्पूर्ण संसार क्रोध की अग्नि से चतुर्दिक जल रहा है। यह आग अत्यंत प्रवल है। लेकिन संत साधु की संगतिशीतल होती है जहाॅं हम भाग कर बच सकते हैं।

दोहा-3

क्रोध अगिन घर घर बढ़ी, जलै सकल संसार

 दीन लीन निज भक्त जो तिनके निकट उबार।

अर्थ : घर-घर क्रोध की अग्नि से सम्पूर्ण संसार जल रहा है परंतु ईश्वर का समर्पित भक्त इस क्रोध की आग से अपने को शीतल कर लेता है। वह सांसरिक तनावों एंव कष्ठों से मुक्त हो जाता है।

दोहा-4

कबीर मन गाफिल भया, सुमिरन लागे नाहि

घानि सहेगा सासना, जम की दरगाह माहि।

अर्थ : कबीर के अनुसार यह मन अत्यंत मूर्ख है और इसे प्रभु के स्मरण में ध्यान नहीं लगता है। इसे अंत में यमराज के दरवार में बहुत दंड भोगना पड़ेगा।

दोहा-5

कबीर मन परबत भया, अब मैं पाया जान

तन की लागी प्रेम की, निकसी कंचन खान।

अर्थ : कबीर के अनुसार मन पहाड़ की भाॅंती हो गया है-यह मैं अब जान पाया हूॅं। जब से इसमे प्रेम का बंधन लगा है तो सोने की खान निकल गया है। प्रभु से प्रेम का बंधन बहुत कीमती है।

दोहा-6

चंचल मन निशचल करै, फिर फिर नाम लगाय

तन मन दोउ बसि करै, ताको कछु नहि जाय।

अर्थ : इस चंचल मन को स्थिर करें। इसे निरंतर प्रभु के नाम में लगावें। अपने शरीर और मन को वश में करें आप का कुछ भी नाश नहीं होगा।

दोहा-7

चिन्ता चित्त विशारिये फिरि बुझिये नहीं आन

इंद्री पसारा मेटिये,सहज मिलिये भगवान।

अर्थ : मन में चिंताओं को भूल जाईये और दूसरों से भी उनकी चिंताओं को मत पूछिये। अपने बिषय इन्द्रियों को फैलने से नियंत्रन करें। आप सहज हीं प्रभु को पा लेगें।

दोहा-8

जहां बाज बासा करै, पंछी रहै ना और

जा घट प्रेम परगट भया, नाहि करम को थौर।

अर्थ : जहाॅं बाज पक्षी रहते है वहाॅं कोई अन्य पक्षी नहीं रह पाता है। जिस शरीर में परमात्मा का प्रेम प्रगट हो जाये वहाॅं पाप एंव दुष्कर्म के लिये कोई जगह नहीं है।

दोहा-9

तेरा बैरी कोइ नहीं, जो मन शीतल होय

तु आपा को डारि दे, दया करै सब कोय।

अर्थ : यदि आप अपने मन को शीतल शांत पवित्र कर लें तो आपका कोई शत्रु नहीं हो सकता। यदि आप अपने घमंड और अहंकार को त्याग दे तो सभी लोग आपको प्रेम करेंगे।

दोहा-10

मन के मते ना चलिये, मन के मते अनेक

जो मन पर अस्वार है, सो साधू कोइ एक।

अर्थ : मन के कहने पर मत चलें। मन के अनेक विचार रहते है। जो मन सर्वदा एक स्थिर रहता है-वह दुर्लभ मन कोई एक होता है। 

दोहा-11

मन के बहुतक रंग है, छिन छिन बदले सोय

एक रंग मे जो रहे, एैसा बिरला कोय।

अर्थ : मन के अनेको रंग-विचार है और यह क्षण-क्षण बदलता रहता है।जो मत सर्वदा एक मन में स्थिर रहता है-वह दुर्लभ कोई एक संत होता है।

दोहा-12

मन कुंजर महमंत था, फिरत गहिर गंभीर

दुहरि,तिहरि,चैहरि,परि गयी प्रेम जंजीर।

अर्थ : यह मन नशेमें झूमता मस्त हाथी की तरह इधर-उधर भागता फिरता है। परंतु जब उसे दो तीन चार फेरे वाली चेन से जकड़ दिया गया तो वह शांत हो गया।यह चेन जंजीर प्रेम का हीं था। प्रेम चित्त को शांत करने का प्रवल उपाय है।

दोहा-13

मन अपना समुझाय ले, आया गफिल होय

बिन समुझै उठि जायेगा, फोगट फेरा तोय।

अर्थ : अपने मन को समझा लो। तुम अनावश्यक भ्रम में पड़े हो। अगर समझ रहते नहीं समझाओगे तो यह शरीर उठ जायेगा और अनावश्यक पुनर्जन्म के चक्कर में भटकता रहेगा।

दोहा-14

सात समुद्र की ऐक लहर, मन की लहर अनेक

कोइ ऐक हरिजन उबरा, डुबि नाव अनेक।

अर्थ : साॅंतो समुद्र की लहरें एक ही है पर मन में अनेक प्रकार की लहरें हैं। शायद कोई एक प्रभु भक्त इससे मुक्ति पाता हे। किंतु अनेकों नाव इसमें डूब चुके हैं।

दोहा-15

इन पांचो से बांधीया, फिर फिर धरै सरीर

जो येह पांचो बसि करै, सोई लागे तीर।

अर्थ : पाॅंच बिषय-वासनाओं में बंध कर मनुष्य अनेक वार जन्म लेकर शरीर धारण करता है। जो इन पाॅंचो को अपने वश में कर लेता है वह इस भवसागर के पार लगजाता है। 

दोहा-16

अकथ कथा या मन की, कहै कबीर समुझाय

जो याको समझा परै, ताको काल ना खाय।

अर्थ : इस मन की कथा अनन्त है। कबीर इसे समझा कर कहते हैं। जिसने इसबात को समझ लिया है उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।

दोहा-17

येह मन मैला नीच है, नीच करम सुहाय

अमृत छारै मन करै, विषय प्रीति सो खाये।

अर्थ : यह मन गंदा और नीच प्रकृति का है। इसे केवल नीच कर्म हीं अच्छा लगता है। यह जानबूझ कर भी अमृत को छोड़ देता है और केवल बिषय-वासना में लिप्त रहता है।

 

kabir das ji ke dohe in hindi (विश्वास)

kabir ke dohe on vishvas

दोहा-1

कबिरा चिंता क्या करु, चिंता से क्या होय

मेरी चिंता हरि करै, चिंता मोहि ना कोय।

अर्थ : कबीरा क्यों चिंता करै? चिंता से क्या होगा? मेरी चिंता प्रभु करते हैं। मुझे किसी तरह की कोई चिंता नहीं है।

दोहा-2

आगे पीछे हरि खरा, आप समहारे भार

जन को दुखी क्यों करे, समरथ सिरजन हार।

अर्थ : भगवान भक्त के आगे पीछे खड़े रहते हैं। वे स्वंय भक्त का भार अपने उपर ले लेते हैं। वे किसी भक्त को दुखी नहीं करना चाहते क्योंकि वे सर्व शक्तिमान हैं।

दोहा-3

राखनहारा राम है, जाय जंगल मे बैठ

हरि कोपै नहि उबरै सात पताले पैठ।

अर्थ : यदि कोई जंगल में है तब भी भगवान उस की रक्षा करते हैं पर भगवान यदि किसी पर कुपित हो तो सात तह पाताल लोक में भी उसकी कोई रक्षा नहीं कर सकता।

दोहा-4

मुरदे को भी देत है कपड़ा पानी आग

जीवत नर चिंता करै, ताका बड़ा अभाग।

अर्थ : ईश्वर मुर्दा के लिये भी कफन कपड़ा,पानी और आग का इंतजाम कर देता है। अतः जीवित मनुष्य का दुर्भाग्य है कि वह अपने जीवन यापन की चिंता करता है।

दोहा-5

जो संचा बिस्वास है, तो दुख क्यों न जाय

कहै कबीर विचारि के तन मन देहि जराय।

अर्थ : यदि ह्दय में परमात्मा के प्रति सच्चा विश्वास हापे तो सभी दुखों का अंत  हो जाता है। कबीर का विचार है कि ईश्वर भक्तों के हृदय के पास एंव दुखाों को भस्म कर देते हैं। 

दोहा-6

चिंता छोरि अचिंत रह देनहार समरथ

पसु पखेरु जन्तु जीव, तिन के गंथि ना हाथ।

अर्थ : चिंता मत करो निश्चिंत रहो, देने वाले ईश्वर सामर्थयवान है। पशु,पक्षी,जीव,जंतु के पास न तो कोई गांठ है ओर न ही हाथ। ईश्वर सबका पालनहार हैं।

दोहा-7

उजल देखि ना धिजिये, बग ज्यों मंदै ध्यान

डारै बैठै चापते सी,यों लै बूरै ज्ञान।

अर्थ : उज्जवल वेश देखकर विश्वास मत करो। बगुला नदी की धार के किनारे बैठ कर ध्यान लगाये रहता है और मछली पकड़ कर खा जाता है। उसी तरह वह धोखे बाज भी साधु के वेश में तुम्हारे विवके का  हरण कर सकता है।

दोहा-8

कबीर वेश अतीत का, अधिक करै अपराध

बाहिर दीशै साधु गति, अंतर बड़ा असाध।

अर्थ : कबीर कहते है की उसका वेश भूसा सन्यासी जैसा है किन्तु वह बड़ा अपराधी है। बाहर से वह साधु जैसा करता है परन्तु अंदर से वह अत्यंत दुष्ट है। ऐसे वेश धारी साधुओं से सावधान रहना चाहिये।

दोहा-9

जेता मीठा बोलना तेता साधु ना जान

पहिले थाह देखि करि, औंदेय देसी आन।

अर्थ : प्रत्येक मीठा बोलने वालों को साधु नहीं समझैं। प्रारम्भ में वे बहुत अपनापन दिखाते है और बाद में वे दूसरा रुप लेलेते है।

दोहा-10

चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहाबै हंस

ते मुक्ता कैसे चुगे, परे काल की फांस।

अर्थ : जिसका चाल चलन बगुले की तरह छल कपट वाला है लेकिन संसार की नजर में वह हंस जैसा अच्छा कहलाता है-वह मुक्ति का मोती नहीं चुग सकता है। वह मृत्यु के फांस में अवश्य गिरेगा। 

दोहा-11

तन को जोगी सब करै, मन को करै ना कोये

सहजये सब सिधि पाइये, जो मन जोगी होये।

अर्थ : शरीर के लिये योगासन सभी करते है पर मन के लिये कोई नहीं करता। यदि कोई मन का योगी हो जाये तो उसे समस्त सिद्धियाॅं उसे प्राप्त हो सकती है।

दोहा-12

दाढ़ी मूछ मूराय के, हुआ घोटम घोट

मन को क्यों नहीं मूरिये, जामै भरीया खोट।

अर्थ : दाढ़ी मूछ मुरबाकर साधु का वेश बना लेना सरल है। तुम अपने मन को मूर कर साफ करो जिस में अनेक बिकार खोट अज्ञाान पाप भरा हुआ है।

दोहा-13

भेश देखि मत भुलिये, बुझि लिजिये ज्ञान

बिन कसौटी होत नहि, कंचन की पेहचान।

अर्थ : संत की वेश भूषा देख कर शंकित मत हो। पहले उनके ज्ञान के संबंध में समझ बुझ लो सोने की पहचान बिना कसौटी पर जाॅच किये नहीं हो सकती है।

दोहा-14

मीठे बोल जु बोलिये, तेते साधु ना जान

पहिले स्वांग दिखाय के, पिछे दीशै आन।

अर्थ :सभी मीठे वचन बोलने वालो को साधु मत समझें। पहले वे अपना स्वांग नौटंकी कलाबाजी दिखाकर आकर्सित करते है-पीछे धोखा देकर लोगों को ठगते है।

दोहा-15

माला पहिरै कौन गुन, मन दुबिधा नहि जाये

मन माला करि राखिये, गुरु चरणन चित लाये।

अर्थ : माला पहनने से कोई लाभ नहीं है-यदि मत की आसंकाये, भ्रम, दुबिधा नहीं मिटते है। अपने मन को ही माला बना कर रखें और गुरु के चरणों में अपने चित्त मन को लगावें। 

दोहा-16

साधु भया तो क्या हुआ, माला पहिरि चार

बाहर भेश बनायिया, भीतर भरि भंगार।

अर्थ : अगर चार मालायें पहन कर साधु हुये तो क्या हुआ? बाहर तो साधु का वेश बना लिया पर अंदर तो बुराईयों का भंडार भरा है।

दोहा-17

हम तो जोगी मनहि के, तन के हैं ते और

मन को जोग लगाबतों, दशा भयि कछु और।

अर्थ : शरीर के योगी अत्य लोग है। हम तो मन के योगी है। यदि मन का योग किया जाये तो हमारी दशाहालत कुछ भिन्न प्रकार की हो जाती है।

kabir ke dohe video

Kabir das ji  the most famous hindi poet  of the india, the beauty about this dohe and poetry was that he describe the every common problem in two line like a song  kabir ke dohe songs

you can check out  video on youtube 

Conclusion

तो यह ज्ञान प्यार मुह माया पर कबीर के दोहे थे। मुझे आशा है की आप इसे पसंद करेंगे

कबीर दास जी के दोहा हमें बहुत ज्ञान देता है जो हमारे दैनिक जीवन में मदद करेगा

kabir  कबीर दास जी के सरल दोहे का पालन करके हम अपना जीवन बदल सकते हैं और एक बेहतर इंसान बन सकते हैं

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