Rahim ke dohe with meaning in hindi-( ज्ञान, समय, मित्रता)

Rahim ke dohe  रहीम दास जी का जन्म 17 दिसम्बर 1556 को हुआ था रहीम दस अब्दुल रहीम बैरम खान के पुत्र थे, रहीम दस जी एक कवि थे जो मुगल सम्राट अकबर के शासन के दौरान थे। वह अपने दरबार के नौ महत्वपूर्ण मंत्रियों में से एक थे, जिन्हें नवरत्नों के नाम named navaratna  से भी जाना जाता है

 

 रहीम को उनके Hindi हिंदी रहीम के दोहे रहीम Rahim ji  के दोहे और उनकी पुस्तकों के लिए जाना जाता है वे भारत के पंजाब राज्य के नवांशहर जिले में रहते थे।

tulsidas तुलसीदस  kabir das कबीर दस और रहीम दस भारत के प्रसीध कवि ते इन महा कवियो के ये विशेषा ता थी के वे सिर्फ़ दो पंक्तियो kabir rahim ke dohe  मे पूरी सामाजिक स्तिति का वर्णन करते थे

रहिम दास- ज्ञान

rahim ke dohe gyan

Rahim ke dohe arth sahit -रहीम के दोहे और अर्थ

  दोहा-1

जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह.
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार धरती शीत, धूप और वर्षा को सहन करती है उसी प्रकार हमारे शरीर body  को भी सुख-दुःख का सहन करना चाहिए.दोहा

दोहा-2

खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय.
रहिमन करुए मुखन को, चाहिए यही सजाय.

अर्थ : खीरे का कडुवापन दूर करने के लिए उसके ऊपरी हिसे को काट कर नमक लगा कर घिसा जाता है. रहीम कहते हैं की इसी प्रकार कड़ुवे मुंह वाले और कटु वचन बोलने वाले के लिए यही सजा ठीक है.

दोहा-3

दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं.
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं.

अर्थ : कौआ और कोयल एक रंग के और एक समान होते हैं। जब तक कौआ और कोयल बोलते नहीं तब तक इनकी पहचान नहीं हो पाती।लेकिन जब वसंत ऋतु आती है तो कोयल की मधुर बोली से दोनों का अंतर स्पष्ट रूप से पता चल जाता है.

दोहा-4

रहिमन अंसुवा नयन ढरि, जिय दुःख प्रगट करेइ,
जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ.

अर्थ : रहीम कहते हैं की असुआँखो से बहकर निकल कर मन का दुःख प्रकट कर देते हैं। उसी प्रकार जिसे घर से निकाला जाता है वह घर का भेद दूसरों से कह ही देगा.

दोहा-5

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय.
सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय.

अर्थ : रहीम कहते हैं की अपने मन के दुःख को मन मे ही रखना चाहिए। जैसे दूसरे का दुःख सुनकर लोग इठला भले ही लें, उसे बाँट कर कम करने का प्रयत्न कोई ना ही करता

दोहा-6

पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन.
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछे कौन.

अर्थ : वर्षा ऋतु months को देखकर कोयल और रहीम दस जी के मन ने मौन साध लिया है.क्यू की उन्हे पता है की अब तो मेंढक ही बोलने वाले हैं। हमारी बात तो कोई नहीं पूछता.इस का अभिप्राय यह है कि कुछ अवसर मे गुणवान व्यक्ति को चुप रह पड़ता है. जब गुणहीन व्यक्तियों का ही बोलबाला हो जाता है.

दोहा-7

रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय.
हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि यदि समसाया कुछ समय की हो तो वह भी ठीक ही है, क्योंकि कठीन समय में ही सबके बारे में जाना जा सकता है कि संसार में कौन हमारा हित छाता है और कौन नहीं।

दोहा-8

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग.
बांटन वारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि वे लोग धन्य हैं जिनका शरीर हमेशा सबका भला करता है. जिस तरा मेंहदी बांटने वाले के शरीर पर भी मेंहदी का रंग लग जाता है, उसी प्रकार परोपकारी का शरीर भी हमेशा सुशोभित रहता है.

दोहा-9

समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात.
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात.

अर्थ : सई वक्त आने पर वृक्ष में फल लगता है। और झड़ने का वक्त आने पर वह झड़ जाते है.रहीम कहते हैं की सदा किसी की दशा एक जैसी नहीं रहती, इसलिए दुःख के समय पछताना व्यर्थ है.

दोहा-10

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय.
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय.

अर्थ : मनुष्य को हमेशा सोचसमझ कर बात करना चाहिए,क्योंकि किसी कारण यदि बात बिगड़ जाती है तो फिर उसे ठीक करना कठिन होता है, जैसे यदि एकबार दूध फट जाए तो कितने भी कोशिश करने पर भी उसे मक्खन नहीं निकाला जा सकता

दोहा-11

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय.
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि प्रेम का धागा बहुत नाज़ुक होता है. यदि यह धागा एक बार टूट जाता है तो फिर इसे जोड़ना बहुत कठिन होता है और यदि जुड़ भी जाए तो टूटे हुए धागों के बीच में एक गाँठ पड़ जाती है.

दोहा-12

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

अर्थ: जिस प्रकार वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते और सरोवर भी स्वयं पानी नहीं पीते है। इसी प्रकार एकअच्छे और सज्जन व्यक्ति वो हैं जो दूसरों के कार्य के लिए संपत्ति को संचित करते हैं।

दोहा-13

खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥

अर्थ: रहीं दस जी का कहॅना है की खैरियत, खून, खांसी, खुशी, दुश्मनी, प्रेम और मदिरा का नशा यहा चीज़े छुपाए नहीं छुपता है।

दोहा-14

जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय॥

अर्थ: रहीं दस जी का कहना है की जब ओछे लोग प्रगति करते हैं तो बहुत ही अकड़ ने लगते हैं। वैसे ही जैसे शतरंज के खेल में जब प्यादा फरजी बन जाता है तो वह टेढ़ी चाल भी चलने लगता है।

दोहा-15

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि.
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि.

अर्थ : रहीम कहते हैं किहमे बड़ी वस्तु को देख कर छोटी वस्तु को फकेना नही चाहिए. क्यू की जहां छोटी सी सुई काम आती है, वहां तलवार क्या कर सकती है

दोहा-16

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग.
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि जो सज्जन मनुष्य होते हैं,उनको बुरी संगति कोई प्रभाव नहीं पड़ता जैसे जहरीले सांप चन्दन के वृक्ष से लिपटे रहने पर भी चन्दन के वृक्ष पर कोई जहरीला प्रभाव नहीं पड़ता

दोहा-17

जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं.
गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि बड़े को छोटा बोलने से बड़े का मूल्य नहीं घटता, जैसे गिरिधर को मुरलीधर बोलने पर उनकी महिमा में कमी नहीं होती.

दोहा-18

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

अर्थ: रहीम का कहना है की जब बुरे दिन का आगमन हों तो चुप ही बैठना ठीक होता है क्योंकि जब अच्छे दिन आते हैं तब बात बने मे देरी नहीं लगती।

दोहा-19

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥

अर्थ: रहीम दस जी का कहना ही की हमे अपने मन से अहंकार का त्याग कर के ऐसी बात करनी चाहिए जिसे सुनकर दूसरों को खुशी मिले और खुद भी खुश हो जाए

दोहा-20

मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥

अर्थ: रहीम का कहना है की मन, मोती, फूल, दूध और रस जब तक सामान्य और सहज रहते हैं तो सबी कोअच्छे लगते हैं लकिन यदि एक बार वे फट जाएं तो करोड़ों प्रयास कर ले ने पर भी वे वापस अपने सहज रूप में नहीं आते।

रहीम के दोहे-समय पर दोहे

 

  दोहा-1

rahim ke dohe samaye

Rahim ke dohe with meaning in hindi class 7 -समय पर दोहे

रहिमन तब लगि ठहरिये दान मान सम्मान
घटत मान देखिये जबहि तुरतहि करिये पयान ।

अर्थ : किसी जगह पर तभी तक रुके ठीक है जब तक आपकी इज्जत और समान हो । जब आपको लगे की आपके आदर समान में कमी हो रही है तो तुरंत वहाॅ से प्रस्थान कर ले

दोहा-2

विपति भये धन ना रहै रहै जो लाख करोर
नभ तारे छिपि जात हैं ज्यों रहीम ये भोर ।

अर्थ : रहीम का कहना है की जिस प्रकार सवेरा होते हीं सारे तारे छिप जाते हैं । उसी प्रकार कठिन समय आने पर धन सम्पत्ति भी चली जाती है भले वह लाखों करोड़ों में क्यू न हो 

दोहा-3

यह रहीम निज संग लै जनमत जगत न कोय
बैर प्रीति अभ्यास जस होत होत हीं होय ।

अर्थ : रहीं का कहना है की कोई व्यक्ति अपने जन्म के साथ दुशमनी प्रेम प्रयास एवं प्रतिश्ठा नही प्राप्त करता है। इन्हें धीरा- धीरा प्राप्त किया जाता है।इनका क्रमिक विकास होता है । 

दोहा-4

समय परे ओछे वचन सबके सहै रहीम
सभा दुसाशन पट गहै गदा लिये रहे भीम ।

अर्थ : जैसे सभा में दुःशासन जब द्रौपदी का चीर हरण कर रहा था तो भीम गदा लेकर भी चुपचाप खड़े रहे उसी प्रकार वीर पुरूश को भी बुरे समय पर कड़वे बोल सहना पड़ता है। समय पर जीबन के लिये ब्यूह रचना करनी पड़ती है।

दोहा-5

समय लाभ सम लाभ नहि समय चूक सम चूक
चतुरन चित रहिमन लगी समय चूक की हूक ।

अर्थ : समय का हमे हमेशा लाभ उटा ना चाहिए समय को बरबाद करने से अधिक हानि होती है।चतुर व्यक्ति से भी चूक हो जाती है और उसका दर्द उन्हें भी सहना पड़ता है अंत जीवन मे समय को अधिक महत्त्व देना चाहिए

दोहा-6

समय दसा कुल देखि कै सबै करत सनमान
रहिमन दीन अनाथ को तुम बिन को भगबान ।

अर्थ : रहीम का कहना है के जिस व्यक्ति का समय हालत और कुल खानदान अच्छा है उसकी व्यक्ति का सब लोग आधार सम्मान और इज्जत करते हैं। लेकिन जो व्यक्ति गरीब और अनाथ होता है उस का भगवान के सिवा कोई नहीं होता है। 

दोहा-7

रहिमन कठिन चितान ते चिंता को चित चेत
चिता दहति निर्जीव को चिंता जीव समेत ।

अर्थ : चिंता करने से व्यक्ति को बचना चाहिये।चिता तो मरे व्यक्ति को एक बार जलाती है पर चिंता जीवित व्यक्ति को बार-बार जला ती है। इसी लिए चिंता चिता से अधिक खराब

दोहा-8

रहिमन चुप ह्वै बैठिये देखि दिनन को फेर
जब नीकै दिन आइहैं बनत न लगिहैं बेर ।

अर्थ : संकट के समय सबूरी रख कर कठिन समय का फेर समझ कर जीना चाहिये। क्यू की अच्छा समय आने पर झटपट सब अपना आप ही ठीक हो जाता है और सब काम सफल हो जाते है। अतः हमे धीरज रख कर समय के बदलने का इंतजार करना चाहिये । 

दोहा-9

रहिमन पानी राखिये बिनु पानी सब सून
पानी गये ना उबरै मोती मानुश चून ।

अर्थ : रहीम का कहना है की जिस प्रकेर पानी की कमी के कारण मोती की चमक और चूना का रंग फीका हो जाता है।उसकी प्रकार हमे अपनी इज्जत बचा कर रकना चाहिए बिना इज्जत के जीवन जीना ब्यर्थ होता है

दोहा-10

जो रहीम भावी कतहुॅ होति आपने हाथ
राम न जाते हरिन संग सीय न रावराा साथ ।

अर्थ : रहीम का कहना है की होनी को कोई नही टाल सकता है। यदि भविश्य जानना हमारे बस में होता तो राम हरिण के पीछे नही जाते और सीता का रावण द्वारा हरण नही होता  | 

  रहीम के दोहे -मित्रता संबंधी दोहे

rahim ke dohe  mitrara

 मित्रता पर दोहे

मथत मथत माखन रहै दही मही बिलगाय
रहिमन सोई मीत है भीर परे ठहराय ।

अर्थ :रहीम कहते हैं कि सच्चा दोस्त बुरा समय आने पर तुरंत सहायता के लिये पहुॅच जाते हैं। दोस्ती की पहचान दुख में हीं होता है। जिस प्रकार दही को बार बार मथने से दही और मक्खन अलग हो जाते हैं।

 

जलहिं मिलाई रहीम ज्यों कियो आपु सग छीर
अगबहिं आपुहि आप त्यों सकल आॅच की भीर ।

अर्थ : जिस प्रकार दूध को पानी अपने में मिला लेता है पर दूध को जब गरम करा जाए तो पानी उपर आ जाता है और अन्त तक सहता रहता है।सच्चे दोस्त की यही पहचान है। 

 

कहि रहीम संपति सगे बनत बहुत बहु रीत
विपति कसौटी जे कसे तेई सांचे मीत ।

अर्थ : धन संपत्ति रहने पर लोग अपने सगे संबंधी बन जाते हैं। लेकिन संकट के समय जो साथ देता है वही सच्चा मित्र और संबंधी है।

रहिमन तुम हमसों करी करी करी जो तीर
बाढे दिन के मीत हेा गाढे दिन रघुबीर ।

अर्थ :रहीम दस जी अब अच्छे और बुरे दिनों के मित्रों को पहचान गया हूॅ। केवल प्रभु हीं अच्छे और बुरे दिनों के मित्र रहते है। कठिनाई के दिनों में मित्र गायब हो जाते हैं और अच्छे दिन आने पर हाजिर हो जाते हैं।

 

रहिमन कीन्ही प्रीति साहब को भावै नही
जिनके अगनित भीत हमैं गरीबन को गनै 

अर्थ : रहीम ने अपने मालिक से प्रेम किया किंतु वह प्रेम मालिक को भाया नही-अच्छा नही लगा।स्वाभाविक है कि जिनके अनगिनत मित्र होते हैं-पे गरीब की मित्रता को कयों महत्व देंगें। 

निष्कर्ष

rahim ke dohe दोस्ती के समय और ज्ञान पर यह रिम की दोहे थे

यदि आप अपने जीवन को बदलना चाहते हैं तो अपने जीवन में हर एक को लागू करना शुरू करें, इसमें कोई शक नहीं कि आपका जीवन बदल जाएगा

मुझे उम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आया होगा

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