Goswami Tulsidas ke dohe in Hindi with meaning

गोस्वामी तुलसीदास Tuslidas ke dohe  जी एक हिंदू संत और कवि थे, तुलसीदास जी ने संस्कृत और अवधी में कई लोकप्रिय रचनाएँ लिखीं, उन्हें रामचरितमानस Ramcharitmanas के लेखक के रूप में जाना जाता है, जो राम के जीवन पर आधारित रामायण का एक लेख है, तुलसी दास जी भगवान राम के एक महान भक्त थे।

tulsi das ke dohe

तुलसीदास  ने अपना अधिकांश जीवन वाराणसी शहर में बिताया। उन्हें हिंदी, भारतीय और विश्व के सबसे महान कवियों में से एक माना जाता है।

रामलीला नाटकों की शुरुआत तुलसीदास जी ने की भारत में कला संस्कृति और समाज पर उनके काम व्यापक हैं  और भारत में आज तक देखे जाते हैं तुलसीदास के दोहे अर्थ सहित  

 तुलसीदास के दोहे- ज्ञान

Sant tuslidas ke dohe – तुलसीदास के दोहे

tulsi das ke dohe on gyan

Tulsidas poems – तुलसीदास के पद

दोहा-1

तुलसी संत सुअंब तरु, फूल फलहि परहेत ।

तते ये पाहन हनत, उतते वे फल देत।

अर्थ:  तुलसीदास जी संत के लक्षण बताते हुए कहते हैं कि संत आम के पेड़ समान है। आम के पेड़ को पत्थर से मारने पर चोट खाकर भी पेड़ हमें मीठे फल अपकार के बदले वह उपकार ही करता है । उसी प्रकार संत को हानि पहुंचाने पर भी वह बदले में भलाई ही करता है ।

दोहा-2

नीच निचाई नहिं तजइ सज्जनहूँ के संग ।

तुलसी चंदन बिटप बसि, बिनु विष भए न भुअंगा।

अर्थ:  तुलसीदास जी ने नीच व्यक्ति के लक्षण के बारे में कहते हैं – नीच सज्जनों के साथ रहने पर भी अपनी नीचता नहीं छोड़ता । सज्जनों का प्रभाव उस पर नहीं पड़ता। तसे साँप चंदन के पेड़ से लिपटे रहने पर भी अपना विपला स्वभाव नहीं छोड़ता ।

दोहा-3

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान,

तुलसी दया न छोडिये जब तक घट में प्राण.

अर्थ:  तुलसीदास जी कहते हैं की धर्म दया की भावना से उत्पन्न होती और अभिमान तो केवल पाप को ही जन्म देता हैं इंसान के शरीर में जब तक प्राण हैं तब तक दया भावना का त्याग कभी नहीं करना चाहिए

दोहा-4

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ और,

बसीकरण इक मंत्र हैं परिहरु बचन कठोर.

अर्थ :- तुलसीदासजी कहते हैं की हमे हमेशा मीठे वचन का उपयोग करना चाईए क्या की ये सुख फैलाते हैं.यह किसी को भी वश में करने का यही एक मंत्र होते हैं इसलिए मानव को कठोर वचन छोड़कर मीठी बोली बोलने का प्रयास करना चाईए | 

दोहा-5

सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय

आस, राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास.

अर्थ :- तुलसीदास जी कहते हैं की मंत्री हकीम और गुरु, ये तीन यदि किसी भय या लाभ की आशा से प्रिय बोलते हैं तो राज्य, शरीर एवं धर्म इन तीन का जल्द ही अंत हो जाता हैं.

दोहा-6
मुखिया मुखु सो चाहिये खान पान कहूँ एक,

पालड़ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक

अर्थ :- तुलसी दास जी कहते है की मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने पिने को तो अकेला हैं, लेकिन विवेकपूर्वक अछी तरहा सब अंगो का पालन ऐवम पोषण करता हैं.| 

दोहा-7

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान

निवासु. जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास.

अर्थ :- तुलसी दास जी कहते है की राम का नाम स्मरण करने से भाँग सा तुलसीदास भी तुलसी के समान पवित्र हो गया. क्यू की राम क नाम कल्पतरु और कल्याण का निवास हैं,

दोहा-8

सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ

सिर मानी, सो पछिताई अघाइ उर अवसि होई हित हानि.

अर्थ :- जो व्यक्ति स्वाभाविक हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सिख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदय में खूब पछताता है और उसके हित की हानि ज़रूर होती हैं

दोहा-9

बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय,

आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय.

अर्थ :- तुलसीदासजी कहते हैं तेजहीन व्यक्ति की बातो को लोग महत्व नहीं देता है ना ही उसकी आज्ञा का पालन करते है. ठीक उसी प्रकार जब राख की आग बुझ जाती हैं तो उसे हर कोई छुने लगता है.| 

तुलसी साथी विपत्ति के विद्या विनय विवेक,

साहस सुकृति सुसत्यव्रत राम भरोसे एक.

अर्थ :- तुलसीदासजी कहते हैं की मुश्किल वक्त में मानव का साथ यह चीजें देती है, ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, आपका सत्य और प्रभु का नाम.

दोहा-10

काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान ।

तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान ।

अर्थ :- तुलसीदासजी कहते हैं कि जब तक मानव के मन में काम, क्रोध, घमंड और लालच भरे पड़े हैं, तब तक ज्ञानी और मूढ़ व्यक्ति के बीच कोई अंतर नहीं होता है, दोनों ही एक जैसे हो जाते हैं । 

दोहा-11

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर ।

सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ।

अर्थ :- तुलसीदास जी कहते हैं कि बुद्धिमान मनुष्य भी सुंदर परिधान देखकर झांसा खा जाते हैं । जैसे मनोरम मयूर को देख लीजिए उसके वचन तो मीठे अमृत के समरूप है लेकिन खुराक सर्प का है ।

दोहा-12

बचन वेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि ।

सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि ।

अर्थ: तुलसीदास कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को उसकी बोल चाल मीठी वाणी और अच्छे पोशाक से यह नहीं जाना सकते की वह सज्जनआदमी है या दुष्ट है। बाहरी सुशोभन और आलंबन से उसके मानसिक हालात का पता नहीं लगा सकते है । जैसे शूपर्णखां, मरीचि, पूतना और रावण के परिधान अच्छे थे लेकिन मन गंदा ।

दोहा-13

तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोई ।

तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोई ।

अर्थ: तुलसीदास कहते हैं कि जो दूसरों की निंदा बुराई करके खुद की पीठ थपथपाने वाले लोग मतिहीन होते है । ऐसे मूढ़ लोगो के मुख पर एक दिन ऐसी कालिख लगेगी जो मरने तक साथ नहीं छोड़ेगी ।

दोहा-14

तनु गुण धन धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान ।
तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहू गत जान ।

अर्थ: तुलसीदास कहते हैं कि जिन लोगों में सुंदरता, अच्छे गुण, संपत्ति, शोहरत और धर्म के बिना भी अहंकार है । ऐसे लोगों जीवन बहुत कष्टप्रद होता है जिसका अंत दुखदाई ही होता है । 

दोहा-15

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु ।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ।

अर्थ: तुलसीदास कहते हैं की एक बहादुर व्यक्ति अपनी वीरता का प्रदर्शन युद्ध के मैदान में शत्रु के सामने लड़कर दिखाते है लकें एक कायर व्यक्ति लड़कर नहीं बल्कि अपनी बातों से ही वीरता का प्रदर्शन दिखाते है ।

दोहा-16

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ।

अर्थ: अगर मानव अपने भीतर और अपने बाहर जीवन में उजाला चाहता है तो तुलसीदास जी कहते हैं कि उसे अपने मुखरूपी प्रवेशद्वार की जिह्वारूपी चौखट पर राम नाम की मणि रखनी चाहिए ।

दोहा-17

तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान ।
भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण ।

अर्थ: गोस्वामी तुलसीदास  जी  कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है न की मनुष्य महान अर्थात मानव बड़ा या छोटा नहीं होता वास्तव में यह उसका समय ही होता है जो बलवान होता है । जैसे एक समय था जब धनुर्धर अर्जुन ने अपने गांडीव से महाभारत का युद्ध जीता था और एक ऐसा भी समय आया जब वही धनुर्धर अर्जुन भीलों के हाथों लुट गये।

दोहा-18

तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग ।
सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग ।

अर्थ: तुलसीदास जी कहते हैं की इस संसार मे आपको सभी से प्रेम भाव से मिल-जुल कर रहना चाहिए । जैसे एक नौका नदी से प्यार से सफ़र कर दूसरे किनारे पहुंच जाती है, ठीक वैसे ही मनुष्य भी सौम्य व्यवहार से जीवन रुपी भवसागर के उस पार पहुंच जाएगा ।

दोहा-19

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए ।
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए ।

अर्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं की हमे भगवान पर भरोसा करना चाहिए और किसी भी भय के बिना शांति से सोइए ।जीवन मे कुछ भी अनावश्यक नहीं होगा, और अगर कुछ अनिष्ट घटना ही है तो वो किसे भे हाल मे घटकर ही रहेगा इसलिए हमे अनर्थक चिंता और परेशानी छोड़ कर मस्त जिए ।

दोहा-20

जनम मरन सब दुख सुख भोगा।हानि लाभ प्रिय मिलन वियोगा।
काल करम बस होहिं गोसाईं।बरबस राति दिवस की नाईं।

अर्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं जन्म मृत्यु सभी दुख सुख के भेाग हानि लाभ प्रिय लोगों से मिलना या बिछुड़ना समय एवं कर्म के अधीन रात एवं दिन की तरह स्वतः होते रहते हैं। 

दोहा-21

सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहीं।दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।
धीरज धरहुं विवेक विचारी।छाड़िअ सोच सकल हितकारी।

अर्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं मूर्ख व्यक्ति सुख के समय खुश रहता है और दुख के समय में रोते विलखते रहता हैं लेकिन एक धीर सज्जन मानव सुख दुख दोनों समय मन में समान रहते हैं। वे धीरज रखकर शोक का परित्याग करते हैं।

दोहा-22

जनि मानहुॅ हियॅ हानि गलानी।काल करम गति अघटित जानी।

समय और कर्म की गति अमिट जानकर अपने हृदय में हानि और ग्लानि कभी मत मानो।

सोचिअ विप्र जो वेद विहीना।तजि निज धरमु विसय लय लीना।

सोचिअ नृपति जो नीति न जाना।जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।

अर्थ: तुलसीदास जी का कहना है की जो ब्राह्मण वेद ज्ञान नही जानता और अपना कर्तब्य छोड़कर विसय भोगों में लिप्त रहता है।उस ब्राह्मण के लिया दुख करना चाहिये

गोस्वामी तुलसीदस जी कहते है की जो राजा नीति नहीं जानता और जो अपने प्रजा को अपने प्राणों के समान प्रिय नहीं मानता है। उस राजा का भी दुख करना चाहिये | 

दोहा-23

सोचिअ बयसु कृपन धनबानू।जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।
सोचिअ सुद्र विप्र अवमानी।मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।

अर्थ: तुलसीदास जी उस वैश्य के बारे में दुख होना चाहिये जो अतिथि का सत्कार और शिव की भक्ति मन से नही करता है। जो धनी होकर भी कंजूस है तथा वह शुद्र भी दुख के लायक है जो ब्राह्मण का अपमान करता है और अधिक बोलने और मान सम्मान इज्जत चाहने वाला हो तथा जिसे अपने ज्ञान का बहुत घमंड हो।

दोहा-24

सोचिअ पुनि पति बंचक नारी।कुटिल कलह प्रिय इच्छाचारी।
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई।जो नहि गुर आयसु अनुसरई।

अर्थ: तुलसीदास जी का कहना है की जो पति से छल करने बाली कुटिल झगड़ालू ओर मनमानी करने वाली पत्नी है।उस स्त्री का भी दुख करना चाहिये और जो ब्रह्मचर्यब्रत छोड़कर गुरू के आदेश पर नहीं चलता है।उस ब्रह्मचारी का भी दुख करना चाहिये | 

दोहा-25

सोचिअ गृही जो मोहवस करइ करम पथ त्याग
सोचिअ जती प्रपंच रत विगत विवेक विराग।

अर्थ: तुलसीदास जी के अनुसार जिसने मोहवश के कारण अपने कर्म को छोड़ दिया है।उस गृहस्थ का भी सोच करना चाहिये और जो सांसारिक जंजाल में फॅसकर ज्ञान वैराग्य से विरक्त हो गया है।उस सन्यासी का भी दुख करना चाहिये 

 Mitrata par doha in hindi with meaning-मित्रता

tulsi das ke dohe on friendship

5 dohe on friendship in hindi 

दोहा-1

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।तिन्हहि विलोकत पातक भारी।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना।मित्रक दुख रज मेरू समाना।

अर्थ: जो अपने मित्र के दुख से दुखी नहीं होते उको देखने से भी भारी पाप लगता है। तुलसी दस जी का कहना है के अपने पहाड़ समान दुख को धूल के बराबर मानना चाहिये। और मित्र के साधारण दुख को भी सुमेरू पर्वत के समान जानना चाहिये। 

दोहा-2

जिन्ह कें अति मति सहज न आई।ते सठ कत हठि करत मिताई।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा ।गुन प्रगटै अबगुनन्हि दुरावा।

अर्थ: सच्चा मित्र हमे गलत रास्ते पर जाने से रोक कर अच्छे रास्ते पर चलाते हैं और अवगुण छिपाकर केवल गुणों को प्रकट करते हैं।जिनके स्वभाव में इस प्रकार की बुद्धि न हो वे मूर्ख केवल हठ करके हीं मित्रता करते हैं। 

दोहा-3

देत लेत मन संक न धरई।बल अनुमान सदा हित करई।
विपति काल कर सतगुननेहा।श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।

अर्थ: मित्रता मे लेन देन करने में शंका न करे।अपनी शक्ति के अनुसार हमेशा मित्र की भलाई करे। वेद के मुताबिक पराशनि या संकट के समय वह सौ गुणा स्नेह प्रेम करता है।अच्छे मित्र का यही गुण है।

दोहा-4

आगें कह मृदु वचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई।
जाकर चित अहिगत सम भाई।अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।

अर्थ: जो हमारे सामने मीठा बोलता और हमे से अधिक प्रेम का नाटक करता है और पीछे मन में बुराई रखता है तथा जिसका मन साॅप की चाल के समान टेढा है ऐसे मित्र को त्यागने में हीं भलाई है।

Goswami tulsidas ke dohe -घमंड

 ghamand

dohawali in hindi 

दोहा-1

बड अधिकार दच्छ जब पावा।अति अभिमानु हृदय तब आबा।
नहि कोउ अस जनमा जग माहीं।प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं।

अर्थ: जब दक्ष को राज की उपदी मिला तो उसके मन में अत्यधिक घमंड आ गया। दुनिया में ऐसा किसी ने जन्म नही लिया जिसे अधिकार पाकर घमंड ना आया हो।

दोहा-2

तेहिं ते कहहिं संत श्रुति टेरें।परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।

अर्थ: तुलसीदस जी कहते कि अत्यधिक घमंड माया मोह और मान प्रतिश्ठा को त्याग देने वाले हीं ईश्वर को प्रिय होते हैं।संत और वेद इस बात को पुकार कर कहते हैं

दोहा-3

सूर समर करनी करहि कहि न जनावहिं आपू
विद्यमान रन पाई रिपु कायर कथहिं प्रतापु।

अर्थ: गोस्वामी तुलसिटास जी का कहना है की शत्रु को युद्ध में उपस्थित पाकर कायर हीं अपने प्रताप की डींग हाॅकते हैं।वीर तो युद्ध में वीरता का कार्य करते हैं।डींग नई हाॅकते | 

दोहा-4

लखन कहेउ हॅसि सुनहु मुनि क्रोध पाप कर मूल

जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं विस्व प्रतिकूल।

अर्थ: तुलसीदास जी का कहना है की क्रोध में मनुश्य सभी ग़लत काम कर लेते हैं और संसार में सबका अहित हीं करता हैं। क्यू की क्रोध सभी पापों की जड है।

Tuslidas ke dohe on Ramayana

ramchartimanas

Ramcharitmanas  dohe  श्रीरामचरितमानस 16 वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास  द्वारा रचित अवधी भाषा की एक महाकाव्य कविता है।

रामचरितमानस  शब्द का शाब्दिक अर्थ है “राम के कर्मों की झील। यह हिंदी साहित्य की सबसे महान कृतियों में से एक है।

 इसे सभी भक्ति साहित्य की सबसे बड़ी पुस्तक के रूप में प्रशंसित किया गया है “और” एक भारतीय के जीवन जीने के लिए सबसे अच्छा और सबसे विश्वसनीय मार्गदर्शक

तुलसीदास संस्कृत के महान विद्वान थे।  वह चाहते थे कि राम की कहानी सभी लोगों के लिए सुलभ हो, न कि केवल संस्कृत-भाषी लोगों द्वारा। राम की कहानी को सुलभ बनाने के लिए उन्होंने रामचरितमानस को अवधी भाषा में लिखा  

दोहा-1

साधु चरित सुभ चरित कपासू।निरस विशद गुनमय फल जासू।

जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।वंदनीय जेहि जग जस पावा।

अर्थ: गोस्वामी गे का कहना है के संत स्वयं दुख सहकर अन्य के दोशों को ढकता है।इसी कारण दुनिया में उन्हें यश प्राप्त होता है। संत का चरित्र कपास की भांति उज्जवल है लेकिन उसका फल नीरस विस्तृत और गुणकारी होता है।

दोहा-2

मुद मंगलमय संत समाजू।जो जग जंगम तीरथ राजू।

राम भक्ति जहॅ सुरसरि धारा।सरसई ब्रह्म विचार प्रचारा।

अर्थ: तुलसीदास जी का कहना है की संत समाज ईश्वर भक्ति का प्रचारक है। वह आनन्द और कल्याणप्रद है।वह एक चलता फिरता तीर्थराज है 

दोहा-3

सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग

लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।

अर्थ: जो लोग प्रसन्नता से संतो के विशय में सुनते समझते हैं और उनकी बातो पर अमल करता है वे ही व्यक्ति इसी शरीर एवं जन्म में धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों फल की प्राप्त करते हैं।

दोहा-4

मति कीरति गति भूति भलाई।जब जेहि जतन जहाॅ जेहि पाई।

सो जानव सतसंग प्रभाउ।लोकहुॅ बेद न आन उपाउ।

अर्थ: जिस भी व्यक्ति ने यश बद्धि सदगति सुख सम्पदा प्राप्त किया है-वह संतों की संगति का प्रभाव के कारण है सम्पूर्ण संसार मे वेद और लोक में इनकी प्राप्ति का यही उपायबताया गया हैं।

दोहा-5

बिनु सतसंग विवेक न होई।राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।
सत संगत मुद मंगल मूला।सोई फल सिधि सब साधन फूला ।

अर्थ: तुलसीदास जी का कहना है की प्रभु की कृपा के बिना संत की संगति सहज नही है। संत की संगति बिना विवेक नही होता संत की संगति आनन्द और कल्याण का मूल है।इसका प्राप्त होना हीं फल है।अन्य सभी उपाय केवल फूलमात्र है। 

दोहा-6

सठ सुधरहिं सत संगति पाई।पारस परस कुघात सुहाई।
बिधि बश सुजन कुसंगत परहीं।फनि मनि सम निज गुन अनुसरहिं।

अर्थ: दुश्ट व्यक्ति भी अछी संगति से सुधर जाते हैं।पारस के छूने से लोहा भी सोना हो जाताहै। यदि कभी सज्जन व्यक्ति बुरी संगति में पॅड जाते हैं तब भी वे साॅप के मणि के समान अपना प्रकाश नहीं त्यागते और विश नही ग्रहण करते हैं।  

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